अक्षर ब्रम्ह क्या है सिद्धियाँ कैसे मिलती है जानिये मंत्र रहस्य भाग-1

अक्षर ब्रम्ह क्या है सिद्धियाँ कैसे मिलती है जानिये मंत्र रहस्य

किसी भी साधना या सिद्धि को प्राप्त करने के दो उपाय है प्रथम देवता को सिद्ध कर लिया जाये या देवता के मंत्र को । किन्तु यदी कोई ऎसी विधि आपको मिल जाये जिससे आप सभी देवताओ का सानिध्य प्राप्त कर सके तो कैसा रहेगा ? किन्तु मार्ग कठिन है! सयंम की आवश्यक्ता होगी । और साधना का नाम ही सयंम है । तो शुरु करे विधि किन्तु प्रथम तो  अब तक ये किसी पुस्तक में प्रकाशित नही हुई है । यदि कोई इसको अपना कह के दावा करता है या अपना नाम देने का प्रयास करता है तो वो स्वयं जिम्मेदार होगा अपनी और भक्तो साधको के पतन का कारण होगा । अधूरा ग्यान हमेशा मात्र नाश ही कर सकता है अब ये बाकी के लिये कितनी उपयोगी होगी इसका ग्यान नही है । एक महान योगी महापुरुष को स्वप्न में इसकी प्राप्ति हुई है उन्होंने कृपा कर जगत के कल्याण के लिए प्रदान की है।

सर्व प्रथम तो सभी मंत्र भगवान शिव ने किलन कर के रखे है यदी उतकिलन का ग्यान हो जाये तो आपको किसी भी मंत्र को सिद्ध करने की आवश्यक्ता ही नही पडेगी । सत्य है कि वैदिक ऋषियों ने शब्द को ही देवता कहा है , ऋषि मानते थे उनके लिये कोई महामानव के समान कोई देवता नही होते थे जैसे लोगो ने आज कल कपोल कल्पित देवता बना रखे है । जिस प्रकार संगीत वाद्यो मे सरगम होती है और अलग अलग फ्रिक्वेंसी पे ट्युन कर बजाई जा सकती है उसी प्रकार हमारे शरीर के अंदर भी वही सात सुर है और अनके साथ अनन्य  प्रिक्वेंसीस होती है । ये मुल शब्द ब्रम्ह है।



 { ल-व-र-य-ह-उ-ऊ} ये मुख्य है

  इनके साथ के अक्षरो से आप बाल्यावस्था से परिचित है । ये 16 मात्राये है जिन्हें हम षोडष मातृ्का के नाम से जानते है इनकी उपमा उस माँ के समान है जो संतान को स्तन पान कराती है भले ही  वो काला हो,गोरा हो,रोगी हो,अंधा हो या फिर गुंगा ।

इन्हें माता कहा गया है इन माताओ का कार्य है देवताओं की शक्तियों को बडाना ,चाहे वो गलत हो या सही , इसे ही मात्र प्रेम कहते है । इन माताओ का नाम क्रमश:-

5. अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः  {16} है।

ये कार्य कैसे करते है उसपे चर्चा बाद मे करते है

4. क से लेकर ठ तक –कंठ तक के {12}

अक्षर शिव जी का कंठ है इन अक्षरो के उच्चारण मात्र से हलाहल विष का जन्म होने लगता है । जिसे महादेव ने धारण किया है!

3.  ड से ले कर फ़ तक के {10}

अक्षर डफ़-ली (डमरु} की तरह छाति मे बजते रहते है। यही ममता,करूणा मातृ प्रेम की भावनाओ का निवास है

2.ब से लेकर ल तक के {6}

अक्षर बल एवं शक्ति बडाने वाले है जो शिव जी के लिंग स्थान पर उपस्थित हो संसार को उत्पन्न होने की गति प्रदान करते है!

1.व से श तक के (4)

अक्षर वश जिसके उच्चारण से वशिकरण की शक्ती प्रकट होती है किन्तु यहा शिव अस्थिर अवस्था मे होते है । यही अघोर तंत्र की शव साधना है ये जो दो शब्द है व और श यदि इनको उलट कर दिया जाये तो ये श और व बन जाते है जो महाकाली की मुर्ती या फ़ोटो चित्र मे प्रदर्शित किया जाता है । इन चार शब्दो मे पृथ्वी मे उत्पन्न होने वाले सारे गुण है जैसे

धन ,नाम ,मान ,सत्ता ,क्रोध ,लालच ,काम(सैक्स) ,लोभ ,मोह इत्यादि समस्त कामनाए । इन समस्त भावो पे स्त्रियों का वर्चस्व होता है। इसके आगे

7.  ह से ले कर ज्ञ तक के {6}

अक्षर है जिनका सही क्रम योग्य गुरु ही बता सकते है । मतलब इन 6 अ़क्षरो को सीढ़ी बनाकर ही समाधि ली जाती है । यहाँ गुरुदेव महादेव स्वयं सुक्ष्म रुप से विराजमान होते है,ये मस्तक का स्थान है इसे ही कैलाश पर्वत भी कहते है हिमालय भी और गुरुगद्दी या गुरु सत्ता भी यही है । यहा स्वयं की मृ्त्यु ही है ।

इसी वजह से ग्रहस्थ को इन  6 अक्षरो का उच्चारण नही करना चाहिये। इन अक्षरो से शांति ,मुक्ति ,वैराग्य की प्राप्ती होती है । और यदि ग्रहस्थ इन अक्षरो का उच्चारण करेगा तो वो शांत हो जायेगा ,वैरागी हो जायेगा ,विरक्त होजायेगा तो ग्रह परिवार के लोगो का क्या होगा ,परिवार के कर्तव्यों दिये वचनो का क्या होगा ।

इन सात स्थानो को आप नंबरो से याद रखे । ये विषय इतना बडा है की मुझे विषलेषण करने मे ये  मानव देह की आयुष्य कम पड जायेगा । अभी  जो 54 अ़क्षरो की चर्चा की उनमे से 38 देवता है एवं 16 देवियाँ है ।  और जो जप करता है वह संतान है । अब इनमे से 19 अक्षर आसुरीक है शैतानी है राक्षसी है या आप ऎसा कह सकते है कि ये असुर है । और ये देवताओ से मित्रता नही रखते । यदि इनका उच्चारण  साधना  मे ज्यादा किया जाये तो जीवन नर्क हो जाता है आसुरिक हो जाता है । इनमे सही देवता का चयन आवश्यक है।

किन्तु हमारा विषय मन्त्र साधना है हम अपने विषय पे वापस आते है

 मन्त्र साधन विधि

आशा है मंत्रो से देवताओ का संबंध आप जान चुके होगे। 16 मातृ्काये जिनकी चर्चा प्रारंभ मे हो चुकी है उनके बिना कोई भी देव अपनी उपस्थिति नही रख सकता जैसे क्+अ= क,क्+आ= का क्रमश: इसी प्रकार अन्य सभी । अब यदि मन्त्र सिद्धि करने की आप अभिलाषा रखते है तो इसी प्रकार हर शब्द को लिखे ।

जैसे:- क का कि की .................क:।
ख खा खि खी...............ख: ।

इसि प्रकार पुरे देवताओ के शब्दो को 16 मातृ्काओए से योग करे । इन्हें लिख कर करे ।

एक एक अक्षर को 1100 बार जाप भी करे ।

कुल 54 अक्षरो को 1100 बार 54x1100=59400 ये पुर्ण संख्या है।

एक अक्षर गुणा 16 मातृ्का=16

इसी प्रकार 38 गुणा 16 मातृ्का=608

इससे किसी भी मंत्र का अत्किलन हो जाता है आवश्यकता पडने पर संकल्प ले किसी भी साधना के पूर्व एक बार पुर्ण 54 अक्षरों का गति के साथ 11 बार जाप करे ।  किन्तु जाप जितने बताये गये है उतने ही करे । उत्किलन के बाद मंत्र सिद्ध करने की विधि अलग है ।

उदाहरण  –मंत्र राज का लेते है ।

" ऊँ ऎं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै"

इसमे ऎं का सवालाख जाप,

ह्रीं का सवा लाख जाप,

क्लीं का सवा लाख जाप,

चामुण्डाय़ै का सवालाख जाप

विच्चै का सवा लाख जाप,और अंत मे पुर्ण मंत्र

"ऊँ ऎं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" का सवालाख जाप करे

इतनी मेहनत करने के बाद भी मात्र अनुभुतियो का स्तर प्रारंभ होता है  ये वैदिक विधि है

शेष भाग पढे अजेयभारत के भाग-2 में

रविशराय गौड़
ज्योतिर्विद
अध्यात्मचिन्तक
9926910965

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