आपके साइन करने का तरीका बता देता है आपकी किस्मत, पढ़िए ये खबर

हजारो लाखो लोग एक साथ जन्म् लेते हैI
एक साथ शिक्षा प्राप्त करते है..एक जैसे संस्कार प्राप्त करते हैI
एक जैसे माहौल में में उनका भरण पोषण भी होता हैI
सभी में एक जैसी योग्यता और शिक्षा का स्तर भी होता हैI
परन्तु सभी में भिन्नता होती हैI
सभी के सिग्नेचर अलग अलग होते हैI

एक जैसे नाम वाले एक जैसी शिक्षा वाले एक जैसी योग्यता वाले व्यक्ति भी जब अपना सिग्नेचर करते है तो उनका सिग्नेचर सबसे अलग होता हैI यंहा तक की उनके द्वारा किये गए सारे सिग्नेचर में भी कुछ ना कुछ अंतर अवश्य होता हैI इसे प्रत्येक व्यक्ति अपने सिग्नेचर को देखकर स्वयं जान सकता हैI
व्यक्ति अपना सिग्नेचर स्वयं कैसे बनाता है?
सिग्नेचर में मूल रूप से चार बातो का समावेश होता हैI
1.शरीर
2.बुद्धि
3.मन
4.चित्त (चित्त की धारणा) यही सिग्नेचर से व्यक्ति स्वयं को प्रस्तुत करता हैI

दरअसल सिग्नेचर मन बुद्धि और शरीर की समावस्था चित्त में धारण की हुई धारणा हैI
जिसे सिग्नेचर के द्वारा प्रस्तुत किया जाता हैI मन बुद्धि शरीर की समावस्था ही ध्यान है जो सिग्नेचर के दौरान सहज रूप से मनुष्य को प्राप्त होती है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य स्वयं को सिग्नेचर के द्वारा प्रस्तुत करता हैI

जिससे मनुष्य के बीते हुए समय वर्तमान अवस्था उसकी और भविष्य को निर्धारित करता है..!
सिग्नेचर से मनुष्य स्वयं को प्रस्तुत करता हैI जिसे देखकर व्यक्ति के बारे में जाना जा सकता हैI
और सिग्नेचर को सुधार कर या डिजाइन करके उसके भविष्य को प्रभावित किया जा सकता हैI
व्यक्ति स्वयं अपने नेचर के द्वारा अपने अपने बीते हुए समय के लिए उत्तरदायी होता हैI उसका वर्तमान भी उसके नेचर के द्वारा प्रस्तुत होता हैI हमारी मानसिक क्षमता बौद्धिक क्षमता और शारीरिक अवस्था के समन्वित प्रयास के रूप में हमारा नेचर प्रस्तुत होता हैI इसे ही हम प्रकृति कहते हैI प्रकृति ही नेचर हैI और सिग्नेचर का अर्थ है "साइन आफ नेचर" जो हमारे नेचर को प्रस्तुत करता हैI

हम अपने जीवन में सफल होंगे या असफल होंगे...हमारा नेचर ही तय करता हैI
हमारा नेचर(प्रकृति)ही हमारी भविष्य की स्थिति को सुनिश्चित करता हैI
हमारी शिक्षा ज्ञान सम्पन्नता उपलब्धियां हमारे नेचर से ही हमें प्राप्त होती हैI
बार बार पेन को उठाकर जो व्यक्ति अपना सिग्नेचर करता है, उस व्यक्ति का लक्ष्य बार बार बदलता रहता हैI
ऐसा व्यक्ति एक लक्ष्य पर स्वयं को अपने नेचर(स्वभाव) के कारण केंद्रित नही कर पाता हैI

ऐसा जातक अनेक विषयों में रूचि लेता है अनेक विषयों को उसे ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा होती हैI यदि स्ट्रोक अप टू डाउन लेता है तो भावनाओ में बहकर वो सबन्धित विषयो के प्रति आकर्षित होता है,या दूसरों के प्रभाव में आकर विषयो का चयन करता है, परन्तु उसका नेचर उसे संतुष्टि प्रदान नही करता है, ऐसा व्यक्ति कुछ समय पश्चात अपने लक्ष्य की दिशा को परिवर्तित करता हैI ठीक इसी तरह व्यक्ति के सिग्नेचर में स्ट्रोक एंगल में होते है तो व्यक्ति तकनीकी विषयो परकेंद्रित होता है...कर्व होने पर कलात्मक विचारो के प्रति आकर्षित होता हैI आपका सिग्नेचर आपको सफलता भी दिलाता है और आपकी असफलता का कारण भी बनता हैI
क्योकि आप और आपका नेचर व्यक्त है आपके सिग्नेचर सेI
सिग्नेचर का आकार (साइज)

सन्सार में प्रत्येक व्यक्ति सिग्नेचर करता है. उसका सिग्नेचर का आकार उसके हाथों के आकार के मुताबिक होना चाहिए, इसका एक आदर्श मापदण्ड होता है.हथेली को जोड़ो से टिकाकर पंजे और उंगलियों की मदद से एक सीधी सरल रेखा बार बार खिंचे..उस सरल रेखा की औसत लम्बाई व्यक्ति के सिग्नेचर का आदर्श आकार होता हैI यदि सिग्नेचर का आकार औसत से कम होता है तो व्यक्ति की मानसिक शक्तियां उसे संकुचित बनाती है..यदि यही आकार बड़ा होता है तो उसे उदारता के साथ अतिरिक्त योग्यताएं भी प्रदान करती हैI

अत्याधिक संकुचित आकार के सिग्नेचर व्यक्ति के मन में हीन भावना उतपन्न करते हैI जो व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन सामाजिक जीवन पारिवारिक जीवन व्यवसायिक जीवन के साथ उसके सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करते हैI अत्याधिक संकुचित सिग्नेचर व्यक्ति को शंकालु और आत्मकेंद्रित बनाता हैI
जिसके कारण व्यक्ति जीवन में मिलने वाली सफलताओं से खुद को वंचित रखता हैI
योग्यता होने के बाद भी व्यक्ति अपने नेचर के कारण सफलता प्राप्त नही कर पाता हैI
अत्याधिक संकुचित आकार के सिग्नेचर,व्यक्ति को प्रत्येक क्षेत्र में संकुचित विचारधारा वाला बनाते हैI
संकुचित(अत्यंत छोटे )सिग्नेचर के प्रथम अक्षर का छोटा होना व्यक्ति के उदर(पेट से जुड़े हिस्से आंतो से अमाशय ) से सम्बंधित रोगों को इंगित करता हैI साथ ही कमर के पिछले हिस्से को प्रभावित करता है.!
ऐसे व्यक्ति ज्यादातर अपनी छोटी सोच के कारण सुरक्षात्मक निर्णयों को प्राथमिकता देते हैI
ऐसे व्यक्तियों का मित्र वर्ग अत्यंत सिमित होता हैI
हर समय ये किसी ना किसी बातो को लेकर शंका करते रहते हैI

ऐसे व्यक्ति को कोई भी बात समझाना आसान नही होता हैI
संकुचित सिग्नेचर वाले व्यक्ति खर्च करने के मामले में भी संकुचित होते हैI अत्याधिक कंजूस प्रवृत्ति के होते है..!
ये अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं को भी अपने स्वभाव के कारण पूरा नही कर पाते हैI
संकुचित आकार के सिग्नेचर वाले व्यक्ति सदा भयभीत रहते है, और बिना कारण परिवार के अन्य लोगो को भी इससे प्रभावित करते हैI

ऐसे लोगो से किसी भी बात को मनवाना आसान नही होता हैI
अत्याधिक संकुचित सिग्नेचर के व्यक्ति नौकरी व्यापार सामाजिक व्यवहार आदि में पर्याप्त योग्यता होने पर भी अपनी बात विचार और योजनाएं उचित ढंग से प्रस्तुत नही कर पाते हैI
अनजाने भय से ग्रसित होने के कारण इनका ब्लड प्रेशर भी कम या ज्यादा होता रहता हैI
अत्यंत छोटे आकार मे सिग्नेचर करने वाले व्यक्ति (औसत से 1/3 जितनी जगह ) का मन अत्यंत कुंठा को प्राप्त होता हैI ऐसे व्यक्ति अक्सर अवसाद या निराशा में डूबे रहते है,मित्र वर्ग ना के बराबर होता है चिड़चिड़े स्वभाव के होते है.ज्यादा प्रेशर सहन नही कर पाते हैI और मन ही मन अवसाद और डिप्रेशन के कारण आत्मघात करने के विचारों में खोए रहते हैI इस तरह के सिग्नेचर करने वाले व्यक्ति के मन में आत्महत्या के विचार अक्सर आते है ..!लेकिन हिम्मत ना होने के कारण ये कदम नही उठा पाते है..!
जब परिवार या नौकरी या समाज की और से किसी बात को लेकर अत्याधिक प्रेशर या दबाव आता है तब ये अपनी मानसिक स्थिति को सम्भाल नही पाते है...!और भय एवं निराशा दबाव के कारण ऐसे कदम उठाते है जो अच्छे नही कहे जा सकते है..!
इस तरह के सिग्नेचर करने वाले व्यक्ति का वैवाहिक जीवन भी निराशापूर्ण रहता है...यदि सिग्नेचर एंटीक्लाक वाइस बनाया जाता है तो अनेको बार वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण तो होता ही है..साथ ही अलग अलग होने की स्थिति भी बन जाती है.इस तरह के सिग्नेचर बच्चो के होने पर बच्चे माता पिता के द्वारा जरूरत  से ज्यादा नियंत्रित होने के कारण होते है.जिन बच्चों पर ज्यादा प्रेशर परिवार से माता पिता से प्राप्त होता है तब बच्चे अपना सिग्नेचर अत्यंत छोटा करते है.ऐसे बच्चे दूसरे बच्चों के साथ आसानी से घुल मिल नही पाते है.

स्कुल की अन्य गतिविधियों में उनकी रूचि नही होती है. अंतर्मुखी स्वभाव के होते है..आत्मकेंद्रित है. कंही ना कंही डरे हुए होते है. डरे हुए होने के कारण अपनी बात को उचित ढंग से प्रस्तुत नही कर पाते है. ऐसे बच्चे कुशाग्र बुद्धि के होते हुए भी स्वयं को प्रस्तुत करने में सफल नही हो पाते है. विषय से सम्बंधित ज्ञान होने पर भी वो कंही ना कंही एक अजीब सा प्रेशर स्वयं पर महसूस करते है जिसके कारण वो स्वयं को उचित ढंग से प्रस्तुत नही कर पाते है. इनका मित्र वर्ग भी कम होता है और अपने मित्रों से भी अपने मन की बात नही कलह पाते है...!

ऐसे बच्चे अपनी बात परिवार में भी किसी से नही कहते है. ऐसे बच्चों का दायरा सिमित होता है पूरा समय अपना सिर्फ पढाई करने में गुजारने लगते हैI (अन्य गतिविधियां खेल कूद इत्यादि में इनकी रूचि कम होती है)

यदि ऐसे बच्चों के सिग्नेचर छोटे होते हुए अंत में रिवर्स स्ट्रोक लिया जाता है तो ऐसे सिग्नेचर वाले आत्मघात के रास्ते को अपनाने की प्रवृति को अपना लेते है.

दीपक राठौर
इंदौर ( मध्यप्रदेश)

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