सरकारों को स्कूल खोलने का निर्णय लेने से पहले इस पहलू की ओर ध्यान देना ही पड़ेगा:अशोक अग्रवाल,एडवोकेट


बच्चे,स्कूल और कोरोना काल
   
मैंने अपने वकालत के पेशे में लंबे समय से शिक्षा और स्वास्थ के मुद्दों की  लड़ाई को अदालती गलियारों के बीच धार देते रहने की लगातार कोशिश की है| जिसके कारण शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुडे अधिकांश पहलुओं को जानने-समझने का अवसर भी मिला है,और दिल्ली के संदर्भ में मैं अपने आप को इस मामले में समृद्ध अनुभव करता हूँ|

कोविड-19 की वैश्विक महामारी ने दुनिया भर में जीवन के हर पक्ष को बुरी तरह प्रभावित किया है| शिक्षा और स्वास्थ्य का क्षेत्र  भी इस बीमारी की चपेट में  है| दिल्ली के स्वास्थ्य-क्षेत्र की हालत तो इतनी बुरी तरह चरमरा गई है कि कोरोना के अतिरिक्त किसी अन्य बीमारी से पीड़ित मरीज को सामान्य चिकित्सीय परामर्श तक ले पाना भी दूभर हो गया है| कोरोना की बीमारी को  दुनिया भर के देशों के स्वास्थ्य-सेवाओं की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा सकता है| लंबे समय से शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े रहने के आधार पर मैं यह कहने में तनिक भी हिचक अनुभव नहीं रहा हूँ कि इन दोनों क्षेत्रों में हमारा देश बहुत पिछड़ा है  और बहुत सी चुनौतियों का सामना करता है|

स्कूली शिक्षा-व्यवस्था में इस समय सबसे बड़ा मुद्दा बच्चों की पढाई के लिए स्कूलों के खुलने से जुडा हुआ है| दिल्ली के तमाम अभिभावकों,शिक्षाविदों तथा कई अन्य लोगों से लगभग रोजाना इस मुद्दे के बारे में मुझसे बात होती है| दिल्ली सरकार स्कूलों को खोलने की योजना ‘कोरोना के साथ जीने’ के मन्त्र के साथ बनाने लगी हुई है| डरे हुए अभिभावक अपने आप को समझाने की कोशिश में लगे हुए है| मेरा मानना है कि  कोरोना ने स्कूली शिक्षा को बहुत हद तक स्वास्थ्य-सेवाओं पर आश्रित बना दिया है | देश की केंद्र-राज्य सरकारों को स्कूल खोलने का निर्णय लेने से पहले इस पहलू की ओर ध्यान देना ही पड़ेगा|

आज जब स्कूल नहीं खुले है और अबतक उपलब्ध आकड़ों के अनुसार बच्चे अपने घरों में परिवारवालों की देखरेख के साथ कोरोना से सुरक्षित दूरी पर बने हुए है| शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र की वर्तमान स्थिति और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर मेरा स्पष्ट मानना है कि स्कूलों के खुलने पर यह सुरक्षित दूरी बनीं नहीं रह सकती है,जिसके कारण हमारे बच्चों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा | जीवन की शर्त पर अपने बच्चों को स्कूलों में ‘कोरोना के साथ’ पढने के नहीं भेजा जा सकता है|

स्कूलों में बच्चों के आने के बाद, उनके बीच सोशल/फिजिकल दूरी को बनाये रखने के लिए किये जाने वाले हर तरह के प्रयास (यहाँ तक कि मनोवैज्ञानिक तौर पर उपलब्ध होने वाला सहयोग भी) अपने अंतिम परिणाम में स्कूल को एक ‘जेल’ में ही बदलने वाले साबित होंगे| अपने स्कूल में ही छात्र अपने साथियों से नैसर्गिक-सहज व्यवहार न करने के लिए बुरी तरह मजबूर होगा |स्कूल में  एक रोबोट की तरह व्यवहार करने के बाद भी हमारे बच्चे कोरोना के खतरे से बच नहीं सकते हैं |

भारत में बहुत से स्कूलों को मात्र ‘एक अध्यापक’ के सहारे संचालित किया जाता है, तो वहीं बहुत से स्कूलों में छात्रों-अध्यापकों का अनुपात में भयानक अंतर भी पाया जाता है|यहाँ तक दिल्ली में भी बहुत से स्कूल ‘over crowed’ हैं; जो कई सालों से दो पालियों में संचालित होते हैं|हमारे देश के स्कूलों की बहुत बड़ी संख्या  अपने बच्चों के स्वास्थ्य सहित हर तरह की सहूलियतों के लिए जरूरी  ढांचागत सुविधाओं की भयंकर कमी के शिकार हैं |ऐसे में ये स्कूल अपने छात्रों के बीच लगातर सोशल/फिजिकल दूरी बनाये रख पाने में कितना सफल रह सकता है,यह हम सभी समझ सकते हैं|

कुछ देर के लिए अगर हम यह मान भी ले कि स्कूल बच्चों के आने के बाद उनके बीच सोशल/फिजिकल दूरी को बनाये रखने में सक्षम है,तो मेरा ध्यान घर से स्कूल जाने और स्कूल से घर वापस आने की ओर जाता है| दिल्ली सहित देश भर के निजी और सरकारी स्कूलों के लिए यह एक ऐसी बड़ी समस्या है,जिसे  सामान्य समय में अभिभावक के हिस्से की  ‘जिम्मेदारी’ मानकर काम चला लिया जाता है| कोरोना काल में ‘घर से स्कूल जाने और स्कूल से घर वापस  आना’ एक बड़ी चुनौती है;जिससे वर्तमान संसाधनों के बल पर पार नहीं पाया जा सकता है|और तो और  सरकारी स्कूल में पढने आने वाले अधिकांश बच्चों के अभिभावक इस ‘जिम्मेदारी' से अनभिज्ञ रहने के लिए मजबूर होते हैं| हमारे बच्चों के जीवन के लिए यह ‘आना-जाना’ खतरे से ही भरा होगा| निजी स्कूलों के जो छात्र बसों आदि से अपने स्कूल जाते है,उन छात्रों के अभिवावकों से सोशल/फिजिकल दूरी बनाये रखने के नाम पर जमकर वसूली की संभावना से भी मुहं नहीं मोड़ा जा सकता है|

स्कूल खोलने के लिए आतुर सरकारें क्या यह बतायेंगीं कि स्कूल खुलने के बाद ‘कोरोना के साथ’ पढने-पढ़ाने के लिए अपने अध्यापकों को उन्होंने किसी तरह का पेशेवर-मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया है कि नहीं? स्कूल में छात्र अपने अध्यापक के ही भरोसे रहता है|जिस बिमारी में ‘दूरी’ बनाये रखना हर हाल में आवश्यक है,उस बीमारी के खतरे के बीच साथ रहते हुए ‘कक्षा-अध्यापन’  की तकनीक किस तरह की होगी? एक अध्यापक अपने बच्चों को  अपने विषय के साथ-साथ मानसिक संबल कैसे देगा? सुबह स्कूल आने के दो चार घंटे के बाद कक्षा में ही किसी अध्यापक या छात्र में कोरोना के लक्षण उभर आने पर उस अध्यापक या बच्चे को ‘संभालने’ के लिए किस तरह का मैकेनिज्म बनाया गया है? क्या अध्यापक को इस तरह की स्थिति को समझने और संभालने के लिए किसी भी तरह से प्रशिक्षित किया गया है? ऐसी स्थिति आने पर स्कूल का प्रिंसिपल  स्वास्थ्य सहायता जल्द से जल्द  स्वास्थ्य सहायता किस व्यवस्था के तहत मुहैया कराएगा ? स्कूल से अपने घर वापस गया छात्र या अध्यापक अगर बीमार पड़ता है; तो उसका इलाज की व्यवस्था किस तरह होगी ? इस तरह के मामले में संबंधित स्कूल अगले दिन किस तरह की कार्य-योजना लागू करेगा ?

स्कूल में छात्र या अध्यापक बीमार  होने पर अस्पताल ही जायेंगे| आज के समय में कोरोना के मरीजों को संभालने में  स्वास्थ्य कई तरह की मुश्किलों का सामना कर रही है| दिल्ली जैसे मेट्रोपोलिटन शहर में गंभीर मरीजों के लिए बेड की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है| ऐसी स्थिति में स्कूल खुलने के बाद  कोई बच्चा या स्कूल से जुडा व्यक्ति कोरोना से संक्रमित होता है,तो  उन्हें निश्चित तौर पर स्वास्थ्य-सुविधा नहीं मिलने तक ‘कोरोना के साथ स्कूल में जा कर पढने’ की बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता है|

अशोक अग्रवाल,एडवोकेट
juristashok@gmail.com
Mobile- 9811101923 


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