जानें और समझें "सिद्धपुर" तीर्थ का महत्व और इतिहास

कैलाश मानसरोवर, नारायण सरोवर, पुष्कर सरोवर, पंपा सरोवर के अलावा पांचवां बिंदु सरोवर अहमदाबाद (गुजरात) से 130 किलोमीटर उत्तर में अवस्थित ऐतिहासिक सिद्धपुर में स्थित है। इस स्थल का वर्णन ऋग्वेद की ऋचाओं में मिलता है जिसमें इसे सरस्वती और गंगा के मध्य अवस्थित बताया गया है। संभवतः सरस्वती और गंगा की अन्य छोटी धाराएं पश्चिम की ओर निकल गई होंगी। इस सरोवर का उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। इसका प्राचीन नाम श्री स्थल है। यह क्षेत्र प्राचीन काम्यकवन में पडता है। महर्षि कर्दम का आश्रम यही पर था। यही भगवान कपिल का अवतार हुआ था। यहां शुद्ध ह्रदय से जो भी कर्म किया जाता है। वह तत्काल सिद्ध हो जाता हैं। औदीच्च ब्राह्मणों की उत्पत्ति यही पर हुई थी। उनके कुल देवता भगवान गोबिंद माधव है।
बिंदु सरोवर 5 पवित्र सरोवरों में से एक है, जो कपिलजी के पिता कर्दम ऋषि का आश्रम था और इस स्थान पर कर्मद ऋषि ने 10,000 वर्ष तक तप किया था। कपिलजी का आश्रम सरस्वती नदी के तट पर बिंदु सरोवर पर था, जो द्वापर का तीर्थ तो था ही आज भी तीर्थ है। कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रणेता और भगवान विष्णु के अवतार हैं।यहीं पर सरस्वती नदी के किनारे से लगभग एक मील दूर बिंदु सरोवर है। बिंदु सरोवर जाते समय मार्ग में गोविंद जी और माधवजी के मंदिर पडते है। बिंदु सरोवर लगभग 40 फुट चकोर एक कुंड है। इसके चारों ओर पक्के घाट बने है। यात्री बिंदु सरोवर मे स्नान करके मातृश्राद करते है। बिंदु सरोवर के पास ही एक बडा सरोवर है। जिसे अल्पा सरोवर कहते है। बिंदु सरोवर पर श्राद्ध करके पिंड अल्पा सरोवर मे विसर्जित किए जाते हैं।
महान ऋषि परशुराम ने भी अपनी माता का श्राद्ध यहां सिद्धपुर में बिंदु सरोवर के तट पर किया था। वर्तमान गुजरात सरकार ने इस बिंदु सरोवर का संपूर्ण पुनरुद्धार कर दिया है जिसके लिए वह बधाई की पात्र है। इस स्थल को गया की तरह दर्जा प्राप्त है। इसे मातृ मोक्ष स्थल भी कहा जाता है।पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध अथवा मोक्ष कर्म और तर्पण का महत्व बताया गया है। इसके लिए बिहार का गया प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि गया में पिता का मोक्ष कर्म एवं तर्पण होता है। सिद्धपुर का कुंड दुनिया में एक मात्र स्थान के बारे में जहां मां का श्राद्ध होता है।यह स्थान है गुजरात स्थित बिंदु सरोवर। यह पाटन जिले के सिद्धपुर में स्थित है। इस स्थान का धार्मिक महत्व बताते हुए पं. दयानन्द शास्त्री जी कहते हैं, मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु नारायण ने कपिल मुनि के रूप में अवतार लिया था। यहां माता देवहुति ने नौ कन्याओं के बाद कपिल भगवान को जन्म लिया था। तब भगवान की आंख से जो खुशी का आंसू (बिंदु) गिरा था, उससे बिंदु सरोवर बना था।गुजरात के पाटन जिले में अवस्थित सिद्धपुर भी एक ऐसा ही सिद्ध और पावन स्थल है। राजधानी अहमदाबाद से एक सौ तीस किलोमीटर उत्तर में अवस्थित सिद्धपुर को "सिद्ध स्थल" के नाम से भी जाना जाता है। सिद्धपुर अहमदाबाद से रोड से तो जुडा है ही, मुंबई दिल्ली मुख्य रेल मार्ग पर अवस्थित होने की वजह से रेल से भी पर्याप्त जुडा है। यह देश में केवल एक ऐसा तीर्थ है जहाँ पुत्र अपनी माता की मोक्ष हेतु कार्तिक माह में आ कर पूजा अर्चना और कर्म काण्ड करते है। इस स्थल का वर्णन ऋगवेद की ऋचाओं में मिलता है, जिसमें इसे सरस्वती और गंगा के मध्य अवस्थित बताया गया है। यहाँ ये अनुसंधान का विषय हो सकता है कि जब गंगा,जमुना और सरस्वती - इन तीन नदियों का संगम प्रयाग (इलाहाबाद) है तो फिर इन में से दो नदियों यथा गंगा और सरवती को किस प्रकार पश्चिम भारत में भी बहते हुए इन शास्त्रों में वर्णित किया गया है। संभवतः सरस्वती और गंगा की अन्य छोटी धाराएं पश्चिम की ओर निकल गयी होगी। इन्हें भी उतना ही पावन और पवित्र माना गया और शास्त्रों में इसकी चर्चा की गयी। सिद्धपुर में सबसे महत्वपूर्ण स्थल बिंदु सरोवर है जिसका वर्णन ऋगवेद की ऋचाओं में किया गया है। बिंदु सरोवर को सरस्वती नदी के तट पर अवस्थित दर्शाया गया है। कपिल मुनि, महर्षि कर्दम और माता देवहुति के पुत्रहैं। कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रणेता और भगवान् विष्णु के अवतार हैं। माना जाता है कि कर्दम ऋषि जब तपस्या को चले गए तो माता देवहुति दुखी हो गयी। ऐसे अवसर पर कपिल मुनि ने उनके समक्ष सांख्य दर्शन की विवेचना करते हुए उनका ध्यान भगवान् विष्णु में केन्द्रित किया। बाद में भगवन विष्णु में ध्यान लगाते हुए माता देवहुति मृत्यु को प्राप्त हुई । माना जाता है कि इसी सरोवर के तट पर माता की मृत्यु पश्चात कपिल मुनि ने उनकी मोक्ष प्राप्ति हेतु अनुष्ठान किया था औरइस प्रकार अपनी माता का श्राद्ध करने वाले प्रथम मुनि हुए। भगवत पुराण में इस घटना का उल्लेख है। इसके बाद ही यह स्थान मातृ मोक्ष स्थल के रूप में प्रसिद्द हुआ। चुकि मुनि ने हिन्दू पंचांग के कार्तिक माह में यह अनुष्ठान किया था,अतः हर वर्ष यहाँ कार्तिक माह में विशाल मेले का आयोजन होता है, जहां दूर और पास से पुत्र अपनी माँ की श्राद्ध हेतु आते है। किम्वदंती यह भी है कि महान ऋषि परशुराम ने भी अपनी माता का श्राद्ध यहाँ सिद्धपुर में बिंदु सरोवर के तट पर किया था। मातृ हन्ता के पाप से मुक्त होने के ऋषि परशुराम के इस प्रयास के प्रमाण के स्वरुप यहाँ मौजूद है ऋषि का आश्रम जिसका जीर्णोद्धार वर्तमान सरकार द्वारा किया गया है।
यह एक दिलचस्प साम्य है कि कपिल मुनि जहां पूरब में गंगासागर से जुड़े है वहीं सुदूर पश्चिम के सिद्धपुर से भी बराबर जुड़े है। इन दोनों ही स्थानों पर कपिल मुनि के आश्रम देखे जा सकते हैं। ये भी दिलचस्प है कि इन दोनों ही स्थलों पर वे मोक्ष की प्राप्ति हेतु आम जन की मदद करते नज़र आते है। ये अवश्य प्रश्न किया जा सकता है कि जब कपिल मुनि के प्रताप से ही राजा भागीरथ ने गंगा का अवतरण करवाया था और उसेगंगासागर तक लाने में सफल हुए थे, तब कपिल मुनि ने उसी स्थान पर मातृ श्राद्ध क्यों नहीं किया? इस सन्दर्भ में यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कपिल मुनि सदृश्य मुनि का अवतरण संपूर्ण विश्व के कल्याण हेतु कभी कभी कल्पों बीत जाने के बाद होता है, और आम जन की सुविधा के लिए उन्होनें देश के इन दोनों भाग में दो विभिन्न अनुष्ठान किये, ताकि इन दोनों ही स्थानों की महत्ता स्थापित हो जाए और मोक्ष की प्राप्ति हेतु आम हिन्दू का मार्ग प्रशस्त हो सके। इन दोनों ही स्थानों का महत्व मोक्ष की प्राप्ति से है। ऐसा लगता है मानो भगवान् विष्णु ने कपिल मुनि का अवतार ही आम हिन्दू जन को मोक्ष दिलाने हेतु किया था। मजेदार साम्य ये भी है कि भगवान् विष्णु ही गया (बिहार)में भी विष्णुपद मंदिर में अवस्थित है और हिन्दू धर्मार्थियों को मोक्ष प्रदान करते नज़र आते है। बिंदु सरोवर में माता के मोक्ष हेतु किये जाने वाला यह विशेष आयोजन हिन्दू परिवार में नारी, ख़ास कर माँ के महत्वपूर्ण स्थान को इंगित करता है। जहां गया में पितरों को पिण्ड दान दिया जाता है, वहाँ माँ के मोक्ष हेतु अलग से अनुष्ठान का प्रावधान इस बात को विशेष तौर से स्थापित करता है कि माँ के दूध का क़र्ज़ को चुकाने का प्रयास जितनी शिद्दत से हिन्दू धर्म में किया जाता है उतना किसी भी अन्य धर्म में नहीं। यह निश्चय ही गौरव की बात है।
बिंदु सरोवर की धार्मिक पृष्ठभूमि
कहा जाता है कि यहां किसी कल्प में देवता एवं असुरों ने समुद्र मंथन किया था। और यही लक्ष्मी जी का प्रादुर्भाव हुआ था। भगवान नारायण लक्ष्मी जी के साथ यहां स्थित हुए। जिसके कारण यह श्री स्थल कहा जाने लगा। सरस्वती के तट पर ही प्रथम सतयुग में महर्षि कर्दम का आश्रम था। कर्दम जी ने दीर्घकाल तक यहां तपस्या की। उस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नारायण प्रकट हुए। महर्षि कर्दम पर अत्यंत कृपा के कारण भगवान के नेत्रों से कुछ अश्रु- बिंदु गिरे, जिसके कारण यह बिंदु स्थल तीर्थ हो गया। स्वाम्भुव मनु ने इसी आश्रम में आकर अपनी कन्या देवहूति को महर्षि कर्दम को अर्पित किया। यही देवहूति से भगवान कपिल का अवतार हुआ। भगवान कपिल ने यही माता देवहूति को ज्ञानोपदेश दिया और वही परम सिद्धि प्राप्त माता देवहूति देह-द्रवित होकर जल रूप मे हो गई।कहा जाता है कि ब्रह्मा की अल्पा नाम की एक पुत्री माता देवहूति की सेवा करती थी। उसने भी माता के साथ भगवान कपिल का ज्ञानोपदेश सुना था, जिसका कारण उसका शरीर भी द्रवित होकर अल्पा सरोवर बन गया। पिता की आज्ञा से परशुरामजी ने माता का वध किया। यद्यपि पिता से वरदान मांगकर उन्होंने माता को जीवित करा दिया, तथापि उन्हें मातृ हत्या का पाप लगा। उस पाप से यहां बिंदु सरोवर और अल्पा सरोवर में स्नान करके और मातृ तर्पण करके वे मुक्त हुए। तभी से यह क्षेत्र मातृश्राद के लिए उपयुक्त माना गया एवं मातृ गया के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महाभारत युद्ध में भीमसेन ने दुःशासन का रक्त मुख से लगाया था। श्रीकृष्ण की आज्ञा से यहां आकर सरस्वती में स्नान करके वे इस दोष से मुक्त हुए थे ।बिंदु सरोवर और सिद्धपुर के ऊपर जो महात्म्य बताए गए है। जिनसे इस प्रसिद्ध सिद्धपुर तीर्थ का के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सरस्वती नदी -
सिद्धपुर तीर्थ का एक मुख्य आकर्षण सरस्वती नदी है। यात्री पहले सरस्वती नदी में स्नान करते है। सरस्वती समुद्र में नहीं मिलती, कच्छ की मरूभूमि में लुप्त हो जाती है। इसलिए वह कुमारिका मानी जाती है। नदी के किनारे पक्का घाट है। साथ ही सरस्वती जी का मंदिर है, परंतु सरस्वती में जल थोड़ा रहता है। घाट से धारा अक्सर हटी रहती है। सरस्वती के किनारे एक पीपल का वृक्ष है। नदी के किनारे ही ब्रह्मांडेश्वर शिव मंदिर है। यात्री यहां मातृश्राद करते है। बिंदु सरोवर से आगे बढे तो सरस्वती नदी का किनारा मिलता है। आज यह नदी सूखी है। अहमदाबाद में साबरमती वाटर फ्रंट के तर्ज पर वर्तमान सरकार ने यहाँ भी वाटर फ्रंट बनाने का कार्यक्रम चालू किया है और लगता है आने वाले वर्षों में नदी तल को साफ़ कर इसमें पुनः जल प्रवाहित कर दिया जाएगा। एक ऐतिहासिक नदी, जो काल के गर्भ में खो गयी थी उसे पुनर्जीवित करने का वर्तमान मोदी सरकार का यह प्रयास वास्तव में प्रशंसनीय है। यदि ऐसा होता है तो नरेन्द्र मोदी निश्चय ही कलियुग के भागीरथ कहलाने के हक़दार होगे; इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं।स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में जिस प्रकार देश के प्रथम गृह मंत्री श्री सरदार पटेल ने आगे बढ़ कर भारत के अतीत के गौरव के प्रतिक चिन्हों यथा सोमनाथ और अन्य मंदिरों का पुनरुद्धार करने में सक्रिय भूमिका निभायी थी लगभग उसी भूमिका और वैसे ही प्रयास वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का भी है। यह निश्चय ही प्रशंसनीय कदम है। सरस्वती नदी के तट पर मुक्तिधाम है जहां के मंदिरों का भी पुर्नुद्धार कर दिया गया है। पीपल वृक्ष के नीचे पण्डे बैठे दिख जायेगें। इनके पास पुरानी पुरानी पोथियों में अपने अपने जजमानों का संपूर्ण विववरण दर्ज है। सरस्वती तट पर "गन्धर्व श्मशान" की परंपरा है। यह परंपरा उज्जैनी, काशी, प्रयाग के अलावा सिद्धपुर में आज भी देखा जा सकता है। ऐसी मान्यता है कि अपने मृत बंधू जन की अंतिम क्रिया आदि संपन्न कर लोग लौटते वक़्त अपने मुंह से "चलो चलते हैं" अथवा "चलो लौट चलें" ऐसा नहीं बोलते क्योंकि ऐसा बोलने से परिवार के किसी जन का मृत आत्मा के पास चले जाने का संशय होता है।निकट ही अर्वेदेश्वर मंदिर है जिसे नाथ संप्रदाय द्वारा स्थापित किया गया था। यहाँ आज भी गुरु शिष्य परंपरा में वेदपाठी वेद -पाठ करते नज़र आते है। रूद्र महालय मंदिर भगवान् शिव का पुराना मंदिर है जिसे अब भारत सरकार का पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने अधिग्रहित कर लिया है। आज यह एक संरक्षित स्मारक है।सिद्धपुर से लौटने के रास्ते में उंझा है। यहाँ उमैया देवी का मंदिर दर्शनीय स्थल है। उंझा में सौंफ और जीरे की खुशबू आप फिजा में फैली पायेंगें। यहशहर "भारत की बीज मसाले की राजधानी" के नाम से प्रसिद्द है। उमैया देवी का यह मंदिर एक हज़ार दो सौ साल पुराना है। नए शादी शुदा जोड़े गृहस्थाश्रम में प्रवेश से पहले देवी की पूजा हेतु यहाँ अवश्य आते है। ऐसी मान्यता है कि देवी का आशीर्वाद गृहस्थ को जहां अपने "स्व-धर्म" के पालन की शक्ति प्रदान करता है, वहीं सुहागन को अमर सुहाग का आशीर्वाद प्रदान करता है। हर गृहस्थ जिसे जीवन संग्राम में धर्म अर्थ, काम और मोक्ष की सफलता की कामना होती है वो देवी के आशीर्वाद का इच्छुक अवश्य होता है।
अन्य सरोवर
इसके अलावा अमृत सरोवर (कर्नाटक के नंदी हिल्स पर), कपिल सरोवर (राजस्थान- बीकानेर), कुसुम सरोवर (मथुरा- गोवर्धन), नल सरोवर (गुजरात- अहमदाबाद अभयारण्य में), लोणास सरोवर (महाराष्‍ट्र- बुलढाणा जिला), कृष्ण सरोवर, राम सरोवर, शुद्ध सरोवर आदि अनेक सरोवर हैं जिनका पुराणों में ‍उल्लेख मिलता है।
अमृत सरोवर : कर्नाटक के नंदी हिल्स पर स्थित पर्यटकों को नंदी हिल्‍स की सैर के दौरान अमृत सरोवर की यात्रा की सलाह दी जाती है जिसका विकास बारहमासी झरने से हुआ है। इसी कारण इसे 'अमृत का तालाब' या 'अमृत की झील' भी कहा जाता है। अमृत सरोवर एक खूबसूरत जलस्रोत है, जो इस इलाके का सबसे सुंदर स्‍थल है।अमृत सरोवर सालभर पानी से भरा रहता है। यह स्‍थान रात के दौरान पानी से भरा और चांद की रोशनी में बेहद सुंदर दिखता है। पर्यटक, बेंगलुरु के रास्‍ते से अमृत सरोवर तक आसानी से पहुंच सकते हैं, जो 58 किमी की दूरी पर स्थित है। योगी नंदीदेश्‍वर मंदिर, चबूतरा और श्री उर्ग नरसिम्‍हा मंदिर यहां के कुछ प्रमुख आकर्षणों में से एक है, जो अमृत सरोवर के पास स्थित हैं।
लोणार सरोवर : महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में लोणार सरोवर विश्वप्रसिद्ध है। माना जाता है कि यहां पर लवणासुर का वध किया गया था जिसके कारण इसका नाम लवणासुर सरोवर पड़ा। बाद में यह बिगड़कर 'लोणार' हो गया। लोणार गांव में ही यह सरोवर स्थित है। इस सरोवर को यूनेस्को ने अपनी सूची में शामिल कर रखा है।
ज्ञान वापी
बिंदु सरोवर से थोडी दूर एक पुरानी बावली है। बिंदु सरोवर में स्नान करने के बाद यहां स्नान किया जाता है। यहां माता देवहूति भगवान कपिल से ज्ञानोपदेश प्राप्त करके जलरूप हो गई थी। वही इस ज्ञानवापी का जल है।
रूद्र महालय
गुर्जरेश्वर मूलराज सोलंकी और सिद्धराज जयसिंह द्वारा निर्मित यह अदभुत एवं विशाल मंदिर अलाउद्दीन खिलजी ने नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। यह मंदिर सरस्वती के पास ही था। अब इसके कुछ भग्नावशेष सुरक्षित है,और कुछ भाग मुसलमानों के अधिकार में है। इस भाग में एक शिखरदार मंदिर तथा मंदिर का विस्तृत सभामंडप और उसके सामने का कुंड अब मस्जिद के काम में लिया जाता है।
इसके अलावा सिद्धपुर मे कई दर्शनीय मंदिर भी है। जिनके भी दर्शन भी किए जा सकते है। सिद्धेश्वर मंदिर, गोविंदमाधव मंदिर, हाटकेश्वर मंदिर, भूतनाथ महादेव मंदिर, श्री राधा-कृष्ण मंदिर, रणछोड़ जी मंदिर, नीलकंठेश्वर मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, ब्रह्मांडेश्वर मंदिर, अम्बा माता मंदिर, कनकेश्वरी मंदिर तथा आशापुरी माता मंदिर मुख्य रूप से दर्शनीय है।
कैसे पहुंचे सिद्धपुर
पश्चिम रेलवे की अहमदाबाद-दिल्ली लाइन पर मेहसाणा और आबूरोड स्टेशन के बीच सिद्धपुर रेलवे स्टेशन पड़ता है। यह मेहसाणा से लगभग 21 मील और आबूरोड से लगभग 19 मील की दूरी पर स्थित है। स्टेशन से लगभग एक मील की दूरी पर सरस्वती नदी के तट पर सिद्धपुर नगर है। सरस्वती नदी से बिंदु सरोवर एक मील की दूरी पर है। किंतु स्टेशन से उसकी दूरी आधे मील से भी कम है। मेहसाणा, आबू और गुजरात के प्रमुख शहरों से बस सेवाएं भी उपलब्ध है।

Post a Comment

0 Comments