न‍िर्जला एकादशी व्रत,आध्यात्मिक , पौराणिक , वैज्ञानिक महत्व मुहूर्त पूजन व‍िध‍ि

न‍िर्जला एकादशी व्रत,आध्यात्मिक , पौराणिक , वैज्ञानिक महत्व मुहूर्त पूजन व‍िध‍ि


एकादशी तिथि प्रारंभ - दोपहर 02:57
(01 जून 2020)
एकादशी तिथि समाप्त - दोपहर 12:04 (02 जून 2020)
पारण मुहूर्त -सुबह 05:23 से 08:8 तक (03 जून 2020)

ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। इस एकादशी को भीम सैनी एकादशी भी कहते है।  महीने में जो एकादशी व्रत होते हैं। ये पूर्णिमा से पहले वाली एकादशी है। इस दिन व्रत रखने वाला सूर्योदय से सूर्योदय तक जल नहीं पीता है। कहते हैं कि जल पीने से व्रत टूट जाता है।
 इस दिन श्री हरि विष्णु की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु को यह व्रत सबसे ज्यादा प्रिय है। इस व्रत में बहुत गर्मी के बीच जल नहीं पीने के कारण कठिन व्रत माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु का मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप करना बहुत शुभ होता है। व्रत के नियम एक दिन पहले गंगा दशहरा से ही शुरू हो जाते हैं। इस दिन भी गंगा दशहरा की ही तरह दान करना बहुत शुभ माना जाता है।

निर्जला एकादशी व्रत पौराणिक युगीन ऋषि-मुनियों द्वारा पंचतत्व के एक प्रमुख तत्व जल की महत्ता को निर्धारित करता है। जप, तप, योग, साधना, हवन, यज्ञ, व्रत, उपवास सभी अंतःकरण को पवित्र करने के साधन माने गए हैं, जिससे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और राग-द्वेष से निवृत्ति पाई जा सके।
 इस दिन प्रातःकाल से लेकर दूसरे दिन द्वादशी की प्रातःकाल तक उपवास करने की अनुशंसा की गई है। दूसरे दिन जल कलश का विधिवत पूजन किया जाता है। तत्पश्चात कलश को दान में देने का विधान है। इसके बाद ही व्रती को जलपान, स्वल्पाहार, फलाहार या भोजन करने की अनुमति प्रदान की गई है।

व्रत के दौरान 'ॐ नमो नारायण' या विष्णु भगवान का द्वादश अक्षरों का मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का सतत एवं निर्बाध जप करना चाहिए। भगवान की कृपा से व्रती सभी कर्मबंधनों से मुक्त हो जाता है और विष्णुधाम को जाता है, ऐसी धार्मिक मान्यता है।

तुलसीदास जी ने भी मोह को सकल व्याधियों का मूल बताया है। सर्वमान्य तथ्य है कि संपूर्ण ब्रह्मांड व मानव शरीर पंचभूतों से निर्मित है। ये पांच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश हैं। पृथ्वी व आकाश तत्व हमेशा ही हमारे साथ रहते हैं और हवाई यात्रा के दौरान यदि पृथ्वी से संपर्क छूटता है, तब भी आकाश तत्व सदैव साथ रहता है।

वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य शरीर में यदि जल की कमी आ जाए तो जीवन खतरे में पड़ जाता है। वर्तमान युग में जब जल की कमी की गंभीर चुनौतियां सारा संसार स्वीकार कर रहा है, जल को एक पेय के स्थान पर तत्व के रूप में पहचानना दार्शनिक धरातल पर जरूरी है।

निर्जला व्रत में व्रती जल के कृत्रिम अभाव के बीच समय बिताता है। जल उपलब्ध होते हुए भी उसे ग्रहण न करने का संकल्प लेने और समयावधि के पश्चात जल ग्रहण करने से जल तत्व के बारे में व पंचभूतों के बारे में मनन प्रारंभ होता है। व्रत करने वाला जल तत्व की महत्ता समझने लगता है।

पौराणिक महत्व

निर्जला एकादशी कथा: पाण्डवों में दूसरा भाई भीमसेन खाने-पीने का अत्यधिक शौक़ीन था और अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं था इसी कारण वह एकादशी व्रत को नही कर पाता था। भीम के अलावा सभी पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे। भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान था। भीमसेन को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहा है। इस दुविधा से उभरने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गया तब महर्षि व्यास ने भीमसेन को साल में एक बार निर्जला एकादशी व्रत को करने कि सलाह दी और कहा कि निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है। इसी पौराणिक कथा के बाद निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी और पाण्डव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।

एक ओर कथा है

एक बार महर्षि व्यास पांडवो के यहाँ पधारे। भीम ने महर्षि व्यास से कहा, भगवान! युधिष्ठर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुन्ती और द्रौपदी सभी एकादशी का व्रत करते है और मुझसे भी व्रत रख्ने को कहते है परन्तु मैं बिना खाए रह नही सकता है इसलिए चौबीस एकादशियो पर निरहार रहने का कष्ट साधना से बचाकर मुझे कोई ऐसा व्रत बताईये जिसे करने में मुझे विशेष असुविधा न हो और सबका फल भी मुझे मिल जाये। महर्षि व्यास जानते थे कि भीम के उदर में बृक नामक अग्नि है इसलिए अधिक मात्रा में भोजन करने पर भ उसकी भूख शान्त नही होती है महर्षि ने भीम से कहा तुम ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का व्रत रखा करो। इस व्रत मे स्नान आचमन मे पानी पीने से दोष नही होता है इस व्रत से अन्य तेईस एकादशियो के पुण्य का लाभ भी मिलेगा तुम जीवन पर्यन्त इस व्रत का पालन करो भीम ने बडे साहस के साथ निर्जला एकादशी व्रत किया, जिसके परिणाम स्वरूप प्रातः होते होते वह सज्ञाहीन हो गया तब पांडवो ने गगाजल, तुलसी चरणामृत प्रसाद, देकर उनकी मुर्छा दुर की। इसलिए इसे भीमसेन एकादशी भी कहते हैं।

सूर्य पूजा करने की परंपरा

ज्येष्ठ महीने में सूर्य का प्रभाव चरम पर होता है। इस महीने तेज गर्मी रहती है और वाष्पीकरण अधिक होता है। इस कारण नदी, तालाब सूखने लगते हैं, जमीन का जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। लोगों को पानी बर्बाद करने से बचना चाहिए। आप निर्जला एकादशी के मौके पर प्याऊ या मटके लगवाएं। अपने घर के बाहर या छत पर चिड़ियों के लिए दाना-पानी का इंतजाम करें। जल्दी उठकर सूर्य की पूजा करें। ज्येष्ठ महीने में अपने खाने पीने का विशेष ख्याल रखें।

निर्जला एकादशी व्रत विधि

इस दिन सुबह स्नान आदि करके भगवान विष्णु की मूर्ति को जल और गंगाजल से स्नान करवाएं। उन्हें व्रत अर्पित करें और रोली चंदन का टिका करें और पुष्प अर्पित करें, बाद में नारियल भी अर्पित करें। मिठाई और फल के साथ तुलसी का पत्ता रखकर भगवान विष्णु को भोग लगाएं और घी का दीपक जलाए। इस दिन भगवान विष्णु के विधि विधान से पूजा करें और भगवान का ध्यान करते हुए ऊँ नमों भगवतो वासुदेवाय् नम: मंत्र का जाप करें। इस दिन कुछ लोग दान भी करते हैं। इस दिन भक्ति भाव से भगवान का भजन करना और कथा सुननी चाहिए। इस दिन व्रती जल से भरे कलश को सफेद कपड़े से ढक कर रख दे और उस पर चीन तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दें और गरीबों को भी दान करें, तभी निर्जला एकादशी व्रत का विधान पूरा होता है।
 प्रयास करें इस दिन गरीबों और ब्रह्मणों को कपड़े, छाता, जूता, फल, मटका, पंखा, शर्बत, पानी, चीनी आदि का दान करना चाहिए।

इस दिन भी किसी पवित्र नदी में स्नान कर सकते हैं तो ठीक, नहीं तो घर में गंगा जल मिलाकर स्नान करें। स्नान के बाद घर के मंदिर में पूजा करें। पितरों के लिए तर्पण करें। निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु को पीले रंग के कपड़े, फल और अन्न अर्पित करना चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा के उपरांत इस चीजों को किसी ब्राह्मण को दान देना चाहिए।
इस एकादशी पर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना भी उत्तम होता है। अगर निर्जला एकादशी का व्रत न भी कर पाएं तो इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान अवश्य करें।
एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है। संभव हो तो रात में जगकर भगवान का भजन कीर्तन करें। एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें।

 विशेष महत्व

पुराणों के अनुसार जो व्यक्ति निर्जला एकादशी व्रत करता  है, वह जीवन में कभी भी संकटों से नहीं घिरता और उसके जीवन में धन और समृद्धि बनी रहती है।

एकादशी के दिन चावल ना खाने के पीछे जिस तरह से धार्मिक महत्व है ठीक  वैसे ही इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है जो इस तरह से बताया गया है की जिस तरह चंद्रमा का संबंध मन से है उसी तरह जल उसका प्रधान देवता माना गया है वहीं चावल की खेती में सबसे ज्यादा जल की आवश्यकता होती है यानि चावल भी जल प्रधान ही हुआ|एकादशी पर चावल का सेवन करने से चंद्रमा की किरणें शरीर के जल तत्व में हलचल मचाएगी जिस वजह से मन अशांत हो जाएगा और पूजा पाठ में मन नहीं लग पायेगा |

पौराणिक कथा के अनुसार, माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर का त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। मान्‍यता है कि चावल और जौ के रूप में महर्षि मेधा उत्पन्न हुए। यही वजह है चावल और जौ को जीव मानते हैं। कथा के अनुसार जिस दिन महर्षि मेधा का अंश पृथ्वी में समाया उस दिन एकादशी तिथि थी।

इस एकादशी व्रत के करने के अनेक लाभ हैं-
व्यक्ति निरोगी रहता है, राक्षस, भूत-पिशाच आदि योनि से छुटकारा मिलता है,
पापों का नाश होता है, संकटों से मुक्ति मिलती है, सर्वकार्य सिद्ध होते हैं, सौभाग्य प्राप्त होता है, मोक्ष मिलता है, विवाह बाधा समाप्त होती है, धन और समृद्धि आती है, शांति मिलती है, मोह-माया और बंधनों से मुक्ति मिलती है, हर प्रकार के मनोरथ पूर्ण होते हैं, खुशियां मिलती हैं, सिद्धि प्राप्त होती है, उपद्रव शांत होते हैं, दरिद्रता दूर होती है, खोया हुआ सबकुछ फिर से प्राप्त हो जाता है, पितरों को अधोगति से मुक्ति मिलती है, भाग्य जाग्रत होता है, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, पुत्र प्राप्ति होती है, शत्रुओं का नाश होता है, सभी रोगों का नाश होता है, कीर्ति और प्रसिद्धि प्राप्त होती है, वाजपेय और अश्‍वमेध यज्ञ का फल मिलता है और हर कार्य में सफलता मिलती है।

 एकादशी के दिन कुछ विशेष चीजें दान करने से दुर्भाग्य दूर हो जाता है।

1. नमक का दान करने से बुरा समय दूर हो जाता है। घर में भोजन की कमी कभी नहीं रहती।

2. तिल का दान करने से शक्ति मिलती है अगर आप किसी लंबी बीमारी से जूझ रहे हैं तो इससे भी आपको फायदा मिलेगा।  तिल से मृत्यु का भय भी दूर हो जाता है।

3. पुराने कपड़े का दान करने से लंबी आयु का वरदान मिलता है। रोगों से भी मुक्ति मिलती है।

ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो नारायणाय विष्णु सहस्त्रनाम पाठ इसके साथ अन्य स्तोत्र मंत्र जप भजन कीर्तन स्मरण पूजन इत्यादि करके भगवान श्री हरि नारायण का स्मरण करते रहना चाहिए

रविशराय गौड़
ज्योतिर्विद
अध्यात्मचिन्तक
9926910965

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