नेता भी टिड्डियों से कम घातक नहीं : माईकल सैनी


नेता भी टिड्डियों से कम घातक नहीं : माईकल सैनी
मेवात में हो रही बेकदरी पर किसी दल याँ नेता के बयान क्यों नहीं ।
टिड्डियों के आतंक पर अनुमन सभी नेताओं सत्तापक्ष अथवा विपक्ष के बयान जारी हो गए हैं आज के अखबार भरे पड़े हैं मगर जो लोग मेवात में आपसी भाईचारे को जहां बनाने पर जोर देना चाहिए वहीँ उसे तोड़ने के लिए माहौल खराब कर रहे हैं कुछ शरारती तत्व उनके विषय में भी इन नेताओं की चेतना नहीं जागती कभी ।
आए दिन लोगों पर हमले , महिलाओं के खिलाफ यौनशोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं जमीनें कब्जा करने व सस्ते दामों पर बेचकर  लोगों के पलायन के मामले जहां बढ़ रहे हैं , युवतीयों के बलात्कार उनको जबरन उठा ले जाने की और उसके परिजनों के साथ मारपीट व जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं जहां , धर्म परिवर्तन कराने के षड़यंत्र के तहत गतिविधियां चल रही हैं - अरावली पर्वतमाला को 40 सालों में 40% खनन कर नष्ट कर दिया गया मेवात में  , लोगों को राशन वितरण में भी भेदभाव के मामले उजागर हो रहे हैं - वहाँ जहां पानी पहुंचाने के लिए किसी ने प्रयास नहीं किया ,
गौहत्त्याओं का ग्राफ लोकडाउन के दौरान भी जहां नहीं घटा - अशिक्षित ड्राइवरों की रोजी रोटी पर ताले लगा दिए गए उनके लाइसेंस रद्द करके - जहां के किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं उसी मेवात की बातें कर रहा हूँ - जहां पर झूठी रेल चल रही है सदियों से वहीं की ,
जिन समस्याओं पर ईन डिजाइनर पत्रकारों और ड्राइंगरूम नेताओं के लेख व भाषण नहीं निकलते ।
आखिर क्या कारण है  ; क्या मेवात के किसान किसान नहीं ?
वहाँ के गरीब लोग राशन मिलने के लिए आवाज नहीं उठाते इसलियें ?
महिलाओं के मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं होती - यूँ कहें कि दबा दी जाती हैं इनके कानों तक नहीं पहुंचती इसलिए ?
क्या मेवात के लोग बेहतर चिकित्सा के लिए एकत्रित होकर आंदोलन नहीं करते इसलियें ?
वहाँ के बच्चे उन्नति पथ में सहायक नहीं हो सकते अर्थात अच्छी शिक्षा नहीं  उन्हें प्रतिभाशाली नहीं समझती सरकार ?
लोग अपनी अपनी बारी से पडताड़न सहन कर चुप हो जाते हैं  इसलियें  उनके समाधानों के विषय में नहीं सोचते हैं नेता और सरकारें ?
बकौल तरविंदर सैनी ( माईकल ) मेवात के पिछड़ेपन के लिए केवल अशिक्षा , आपसी भेदभाव , सम्प्रदायवाद ही जिमेवार हैं , जिसे दूर करने के लिए जब चुनी हुई सरकारें  असमर्थता दिखाएँ तब जागरूक लोगों को नेतृत्व परिवर्तन कर योग्य व्यक्तियों को चुनकर अयोग्य व्यक्तियों के स्थान पर आसीन कर देना चाहिए ताकि व्यवस्थाएं बदली जा सकें - पुनः उन्हीं लोगों का चयन कर स्तिथियाँ जस की तस नहीं रखनी चाहिए ।
याद रखना चाहिए कि आमजन से नेता हैं नेता से आमजन नहीं  ,
जनता जमीन है तो नेता उसमें से उपजा बीज मात्र है और प्रकृति का नियम है कि जब जमीन अपनी पकड़ छोड़ देती है तो बड़े दरख़्त भी भरभरा कर जमींदोज़ हो जाते हैं ।
बातें मेरी मानना ना मानना सोच आपकी ।

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