धनतेरस पर लक्ष्मी , कुबेर , धन्वंतरि , यमाराधना के साथ करे दीपदान

 धनतेरस पर लक्ष्मी , कुबेर ,  धन्वंतरि , यमाराधना के साथ करे दीपदान



पौराणिक , आध्यात्मिक , महत्व के साथ मनाए धन तेरस पर्व


धनतेरस निर्णय


इस बार धनतेरस की त्रयोदशी तिथि 12 नवंबर 2020 गुरुवार को रा‍त्रि 09 बजकर 30 मिनट से प्रारंभ होकर 13 नवंबर शुक्रवार शाम 05 बजकर 59 मिनट तक रहेगा। ऐसे में धनतेरस 13 नवंबर को है। 


धन और वैभव देने वाली इस त्रयोदशी का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन लक्ष्मी– गणेश और कुबेर की पूजा की जाती है। इस वर्ष धनतेरस गुरुवार यानी 12 नवंबर और शुक्रवार यानी 13 नवंबर को मनाया जाएगा। ऐसा, धनतेरस की तिथि को लेकर लोगों के बीच असमंजस की वजह से है। ज्योतिर्विद रविशराय गौड़ के अनुसार, 12 नवंबर को रात 9.30 बजे तक द्वादशी तिथि है। इसीलिए गुरुवार को दिन धनतेरस की पूजा नहीं की जा सकती। वहीं त्रयोदशी तिथि यानी धनतेरस समयानुसार गुरुवार रात 9 बजकर 30 मिनट पर शुरू होगा। जबकि 13 नवंबर शुक्रवार को शाम को 5 बजकर 59 मिनट तक त्रयोदशी है। प्रदोष काल होने के कारण धनतेरस की पूजा 13 नवंबर को करना शुभ है।



धन तेरस पूजा मुहूर्त :-


धनतेरस तिथि – शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

धनतेरस पूजन मुहूर्त – शाम 05:25 बजे से शाम 05:59 बजे तक।

प्रदोष काल – शाम 05:25 से रात 08:06 बजे तक।

वृषभ काल – शाम 05:33 से शाम 07:29 बजे तक।

त्रयोदशी तिथि प्रारंभ-12 नवंबर 2020 की रात 09:30 बजे से।


धनतेरस पर दीपदान करे और अकाल मृत्यु से बचे


 पौराणिक कथाएं


धन तेरस पर यमराज को जो दीपदान किया जाता है या कहें कि उनके निमित्त घर के चारों ओर दीप जलाकर उनकी पूजा की जाती है। आखिर धनतेरस पर यमराज की पूजा क्यों की जाती है? इसके पीछे दो कथाएं प्रचलित हैं।

 

1.पहली कथा : इस कथा के अनुसार एक बार यमदूत एक राजा को उठाकर नरक ले आए। नरक में राजा ने यमदूत से कहा कि मुझे नरक क्यों लाए हो? मैंने तो कोई पाप नहीं किया है। इस पर यमदूत ने कहा कि एक बार एक भूखे विप्र को आपने अपने द्वार से भूखा ही लौटा दिया था। इसीलिए नरक लाए हैं। राजा ने कहा कि कहा कि नरक में जाने से पहले मुझे एक वर्ष का समय दो। यमदूत ने यमराज की सलाह पर एक वर्ष का समय दे दिया।


राजा पुन: जीवित हो गया और फिर वह ऋषि-मुनियों के पास गया और उसने उन्हें अपनी सारी कहानी बता दी। तब ऋषियों के कहने पर राजा ने कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को खुद ने व्रत रखा और ब्राह्मणों को एकत्रित कर उन्हें भरपेट भोजन कराया। वर्षभर बाद यमदूत राजा को फिर लेने आए और इस बार वे नरक ले जाने के बजाए, विष्णु लोक ले गए। तभी से इस दिन यमराज की पूजा की जाती है और उनके नाम का दीपक लगाया जाता है।


2.दूसरी कथा : दूसरी कथा के अनुसार हिम नाम के एक राजा का पुत्र हुआ तो ज्योतिषियों ने बताया कि यह अपने विवाह के चौथे दिन मर जाएगा। राजा इस बात से चिंतित हो गया। पुत्र बड़ा हुआ तो विवाह तो करना ही था। उसका विवाह कर दिया गया। विवाह का जब चौथा दिन आया तो सभी को राजकुमार की मृत्यु का भय सताने लगा लेकिन उसकी पत्नी निश्‍चिंत होकर महालक्ष्मी की पूजा करने लगी, क्योंकि वह महालक्ष्मी की भक्त थी। पत्नी ने उस दिन घर के अंदर और बाहर चारों ओर दीये जलाए और भजन करने लगी।

उस दिन सर्प के रूप में यमराज ने घर में प्रवेश किया ताकि राजकुमार को डंस कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी जाए। लेकिन दीपों की रोशनी से सर्प की आंखें चौंधियां गई और उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था की किधर जाएं। ऐसे में वह राजकुमार की पत्नी के पास पहुंच गया जहां वह महालक्ष्मी की आरती गा रही थी। सर्प भी उस मधुर आवाज और घंटी की धुन में मगन हो गया। सुबह होने के सर्प के भेष में आए यमराज को खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि मृत्यु का समय टल चुका था। इससे राजकुमार अपनी पत्नी के कारण दीर्घायु हुए और तभी से इस दिन यमराज के लिए दीप जलाने की प्रथा प्रचलन में आ गई।


दीपदान : धनतेरस के दिन यमराज के निमित्त जिस घर में दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती है। धनतेरस की शाम को मुख्य द्वार पर 13 और घर के अंदर भी 13 दीप जलाने होते हैं। लेकिन यम के नाम का दीपक परिवार के सभी सदस्यों के घर आने और खाने-पीने के बाद सोते समय जलाया जाता है। इस दीप को जलाने के लिए पुराने दीपक का उपयोग किया जाता है जिसमें सरसों का तेल डाला जाता है। यह दीपक घर से बाहर दक्षिण की ओर मुख कर नाली या कूड़े के ढेर के पास रख दिया जाता है। इसके बाद जल चढ़ा कर दीपदान करते समय यह मंत्र बोला जाता है-


मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह।

त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यज: प्रीतयामिति।।


कई घरों में इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दीया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे लेकर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दीये को नहीं देखते हैं। यह दीया यम का दीया कहलाता है। माना जाता है कि पूरे घर में इसे घूमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।


कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी तिथि को धन तेरस का त्यौहार मनाया जाता हैं  इस दिन धन्वन्तरी जयंती भी मनाई जाती हैं  देव चिकित्सक भगवान धन्वन्तरी का जन्म पुराणों के अनुसार एक समय अमृत प्राप्ति हेतु देवासुरों ने जब समुन्द्र मन्धन किया ,तब उसमे से दिव्य कान्ति युक्त , अलकरनो से सुसज्जित , सर्वांग सुन्दर , तेजस्वी , हाथ में अमृत कलश लिए हुए एक अलौकिक पुरुष प्रकट हुए । वे ही औयुवेद प्रवर्तक भगवान धन्वन्तरी थे ।  इस त्यौहार का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्त्व हैं ।

इसी दिन से दीपावली का प्रारम्भ माना जाता हैं । इसी दिन से दीप जलाने की शुरुआत होती हैं । इस दिन नये बर्तन या चांदी का सिक्का , कोई चांदी का बर्तन अपने घर में लाना आवश्यक हैं ।


यह त्यौहार दीपावली के दो दिन पहले मनाया जाता हैं । धार्मिक और एतिहासिक द्रष्टि से इस दिन का विशेष महत्त्व हैं । धनतेरस के दिन दिए में तेल डालकर चार बत्ती वाला दीपक अपने घर के मुख्य दरवाजे के बाहर जलाये । आज से पूर्व ही सफाई व रंगाई पुताई का कार्य पूर्ण कर दिया जाता हैं तथा घरों में रौशनी व सजावट का कार्य करना शुरू कर देते हैं ।


  धनतेरस की एक कथा 

एक समय भगवान विष्णु पृथ्वी पर विचरण करने आने लगे तब लक्ष्मीजी ने भी साथ चलने का आग्रह किया । तब भगवान विष्णु जी ने कहा यदि आप मेरे आदेश का पालन करे तो चल सकती हैं । आगे आने पर भगवान विष्णु जी ने कहा लक्ष्मी तुम यहां ठहरो में अभी आता हु । लक्ष्मीजी  ने कुछ समय प्रतीक्षा की और फिर चंचल मन के कारण विष्णु भगवान के पीछे चल पड़ी । आगे चलने पर फूलो का खेत आया लक्ष्मी जी फूल तौडा फिर गन्ने का खेत आया एक गन्ना लिया और चूसने लगी तभी भगवान विष्णुजी आये और लक्ष्मीजी को श्राप दे दिया की तुमने चौरी की हैं अत: तुम्हे किसान के बारह बरस तक नौकरी करनी पड़ेगी और भगवान लक्ष्मीजी को पृथ्वी पर छौड कर चले गये । माँ लक्ष्मीजी किसान के घर काम करने लगी , उन्होंने किसान की पत्नी से कहा तुम पहले लक्ष्मी जी की पुजा करो फिर भोजन भोजन बनाया करों तुम जों भी मांगोगी तुम्हे मिल जायेगा ।

पुजा के प्रभाव से किसान का घर धन धान्य से भर गया । लक्ष्मी जी ने किसान को धन धान्य से पूर्ण कर दिया । 12 वर्ष बड़े आनन्द से क्त गये । 12 वर्ष बाद विष्णु भगवान लक्ष्मी जी को लेने पधारे , किसान ने मना कर दिया मैं लक्ष्मी जी को नही भेजूंगा तो विष्णु भगवान ने कहा लक्ष्मी चंचल हैं वह कहीं भी ज्यादा समय के लिए नहीं ठहरती । तब भी किसान नही माना तब किसान का अटूट प्रेम देखकर कहा की कल तेरस हैं तुम रात्रि में अखंड दीपक जलाकर रखना और मेरी [ लक्ष्मीजी ] पूजा करना मैं तुम्हे दिखाई नही दूँगी पर तुम्हारे घर साल में पांच दिन धरती पर निवास करूंगी । तभी से धन तेरस से ही लक्ष्मीजी की पूजा की जाती हैं ।


इस दिन ताम्बे के कलश में चांदी के सिक्के भर कर पूजा स्थान में रख देते हैं । उसी में लक्ष्मीजी निवास करती हैं । धनतेरस से लेकर भाई दूज तक दीप दान करने से सुख़ सम्पत्ति ,  समपन्नता ,  धन धान्य ,वैभव , एश्वर्य  आता हैं ।


धन तेरस यह पर्व कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन कुछ नया खरीदने की परंपरा है। विशेषकर पीतल व चांदी के बर्तन खरीदने का रिवाज़ है। मान्यता है कि इस दिन जो कुछ भी खरीदा जाता है उसमें लाभ होता है। धन संपदा में वृद्धि होती है। इसलिये इस दिन लक्ष्मी की पूजा की जाती है। धन्वंतरि भी इसी दिन अवतरित हुए थे इसी कारण इसे धन तेरस कहा जाता है। देवताओं व असुरों द्वारा संयुक्त रूप से किये गये समुद्र मंथन के दौरान प्राप्त हुए चौदह रत्नों में धन्वन्तरि व माता लक्ष्मी शामिल हैं। यह तिथि धनत्रयोदशी के नाम से भी जानी जाती है|

इस दिन लक्ष्मी के साथ धन्वन्तरि की पूजा की जाती है| दीपावली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है| दीपोत्सव का आरंभ धनतेरस से होता है| जैन आगम (जैन साहित्य प्राचीनत) में धनतेरस को 'धन्य तेरस' या 'ध्यान तेरस' कहते हैं| मान्यता है,  भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे| तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हुये| तभी से यह दिन जैन आगम में धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ| धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है|

धनतेरस पर क्यों खरीदे जाते हैं बर्तन

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुंद्र मंथन से धन्वन्तरि प्रकट हुए| धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था| भगवान धन्वन्तरी कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है| विशेषकर पीतल और चाँदी के बर्तन खरीदना चाहिए,  क्योंकि पीतल महर्षि धन्वंतरी का धातु है| इससे घर में आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य लाभ होता है| धनतेरस के दिन धन के देवता कुबेर और यमदेव की पूजा अर्चना का विशेष महत्त्व है| इस दिन को धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है|

धनतेरस पर दक्षिण दिशा में दीप जलाने का महत्त्व

धनतेरस पर दक्षिण दिशा में दिया जलाया जाता है। इसके पिछे की कहानी कुछ यूं है। एक दिन दूत ने बातों ही बातों में यमराज से प्रश्न किया कि अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यमदेव ने कहा कि जो प्राणी धनतेरस की शाम यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दिया जलाकर रखता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती| इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम लोग आँगन में यम देवता के नाम पर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं| फलस्वरूप उपासक और उसके परिवार को मृत्युदेव यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है| विशेषरूप से यदि घर की लक्ष्मी इस दिन दीपदान करें तो पूरा परिवार स्वस्थ रहता है|

धनतेरस पूजा विधि

संध्याकाल में पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है|  पूजा के स्थान पर उत्तर दिशा की तरफ भगवान कुबेर और धन्वन्तरि की मूर्ति स्थापना कर उनकी पूजा करनी चाहिए| इनके साथ ही माता लक्ष्मी और भगवान श्रीगणेश की पूजा का विधान है| ऐसी मान्‍यता है कि भगवान कुबेर को सफेद मिठाई, जबकि धनवंतरि‍ को पीली मिठाई का भोग लगाना चाहिए | क्योंकि धन्वन्तरि को पीली वस्तु अधिक प्रिय है|  पूजा में फूल, फल, चावल, रोली, चंदन, धूप व दीप का इस्तेमाल करना फलदायक होता है| धनतेरस के अवसर पर यमदेव के नाम से एक दीपक निकालने की भी प्रथा है| दीप जलाकर श्रद्धाभाव से यमराज को नमन करना चाहिए।

धन तेरस पर भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा होती है। उन्हें आयुर्वेद का जन्मदाता और देवताओं का चिकित्सक माना जाता है। भगवान विष्णु के 24 अवतारों में 12वां अवतार धन्वंतरि का था।


धन्वंतरि के जन्म के संबंध में हमें तीन कथाएं मिलती हैं:-


1. समुद्र मन्थन से उत्पन्न धन्वंतरि प्रथम : कहते हैं कि भगवान धन्वंतरि की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुए थी। वे समुद्र में से अमृत का कलश लेकर निकले थे जिसके लिए देवों और असुरों में संग्राम हुआ था। समुद्र मंथन की कथा श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण आदि पुराणों में मिलती है।


2. धन्व के पुत्र धन्वंतरि द्वितीय : कहते हैं कि काशी के राजवंश में धन्व नाम के एक राजा ने उपासना करके अज्ज देव को प्रसन्न किया और उन्हें वरदान स्वरूप धन्वंतरि नामक पुत्र मिला। इसका उल्लेख ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण में मिलता है। यह समुद्र मंधन से उत्पन्न धन्वंतरि का दूसरा जन्म था। धन्व काशी नगरी के संस्थापक काश के पुत्र थे।


काशी वंश परंपरा में हमें दो वंशपरंपरा मिलती है। हरिवंश पुराण के अनुसार काश से दीर्घतपा, दीर्घतपा से धन्व धन्वे से धन्वंतरि, धन्वंतरि से केतुमान, केतुमान से भीमरथ, भीमरथ से दिवोदास हुए जबकि विष्णु पुराण के अनुसार काश से काशेय, काशेय से राष्ट्र, राष्ट्र से दीर्घतपा, दीर्घतपा से धन्वंतरि, धन्वंतरि से केतुमान, केतुमान से भीमरथ और भीमरथ से दिवोदास हुए।


3.वीरभद्रा के पुत्र धन्वं‍तरि ​तृतीय : गालव ऋषि जब प्यास से व्याकुल हो वन में भटकर रहे थे तो कहीं से घड़े में पानी लेकर जा रही वीरभद्रा नाम की एक कन्या ने उनकी प्यास बुझायी। इससे प्रसन्न होकर गालव ऋषि ने आशीर्वाद दिया कि तुम योग्य पुत्र की मां बनोगी। लेकिन जब वीरभद्रा ने कहा कि वे तो एक वेश्‍या है तो ऋषि उसे लेकर आश्रम गए और उन्होंने वहां कुश की पुष्पाकृति आदि बनाकर उसके गोद में रख दी और वेद मंत्रों से अभिमंत्रित कर प्रतिष्ठित कर दी वही धन्वंतरि कहलाए।


 उपरोक्त में से प्रथम दो कथाएं ज्यादा मान्य है।

 प्रथम कथा के अनुसार देवता एवं दैत्यों के सम्मिलित प्रयास के शांत हो जाने पर समुद्र में स्वयं ही मंथन चल रहा था जिसके चलते भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। विद्वान कहते हैं कि इस दौरान दरअसल कई प्रकार की औषधियां उत्पन्न हुईं और उसके बाद अमृत निकला।


हालांकि धन्वंतरि वैद्य को आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने विश्वभर की वनस्पतियों पर अध्ययन कर उसके अच्छे और बुरे प्रभाव-गुण को प्रकट किया। धन्वंतरि के हजारों ग्रंथों में से अब केवल धन्वंतरि संहिता ही पाई जाती है, जो आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वंतरिजी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था। बाद में चरक आदि ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।


 

कहते हैं कि धन्वंतरि लगभग 7 हजार ईसापूर्व हुए थे। वे काशी के राजा महाराज धन्व के पुत्र थे। उन्होंने शल्य शास्त्र पर महत्वपूर्ण गवेषणाएं की थीं। उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश दिए। दिवोदास के काल में ही दशराज्ञ का युद्ध हुआ था। धन्वंतरि के जीवन का सबसे बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग अमृत का है। उनके जीवन के साथ अमृत का स्वर्ण कलश जुड़ा है। अमृत निर्माण करने का प्रयोग धन्वंतरि ने स्वर्ण पात्र में ही बताया था।


उन्होंने कहा कि जरा-मृत्यु के विनाश के लिए ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोम नामक अमृत का आविष्कार किया था। धन्वंतरि आदि आयुर्वेदाचार्यों अनुसार 100 प्रकार की मृत्यु है। उनमें एक ही काल मृत्यु है, शेष अकाल मृत्यु रोकने के प्रयास ही आयुर्वेद निदान और चिकित्सा हैं। आयु के न्यूनाधिक्य की एक-एक माप धन्वंतरि ने बताई है।


'धनतेरस' के दिन उनका जन्म हुआ था। धन्वंतरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता हैं। रामायण, महाभारत, सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, काश्यप संहिता तथा अष्टांग हृदय, भाव प्रकाश, शार्गधर, श्रीमद्भावत पुराण आदि में उनका उल्लेख मिलता है। धन्वंतरि नाम से और भी कई आयुर्वेदाचार्य हुए हैं। आयु के पुत्र का नाम धन्वंतरि था।


धनतेरस पर्व तिथि व मुहूर्त 2020


धनतेरस 2020

13 नवंबर

धनतेरस तिथि - शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

धनतेरस पूजन मुर्हुत - शाम 05:25  बजे से शाम 05:59 बजे तक

प्रदोष काल - शाम 05:25 से रात 08:06  बजे तक

वृषभ काल -  शाम 05:33 से शाम 07:29 बजे तक

धनतेरस पूजन मुहूर्त



प्रदोष काल :


सूर्यास्त के बाद के 2 घंटे 36 मिनट तक प्रदोषकाल रहेगा। इस दौरान यम दीपदान और लक्ष्मी पूजन में करना चाहिए,



सांय काल में शुभ महूर्त


प्रदोष काल का समय शाम 5.46 से रात 8.21 बजे तक, स्थिर लग्न शाम 5.50 बजे से रात 7.48 बजे तक रहेगा। त्रयोदशी तिथि शाम 6 बजे खत्म हो जाएगी, इसलिए दीपदान और पूजा इससे पहले कर लेना चाहिए।



चौघाडिया मुहूर्त :


इस दौरान पूजा करने से लाभ होने की मान्यता है। इससे धन, स्वास्थ्य और आयु में बढ़ोतरी होती है।


लाभ- उन्नति मुहूर्त सुबह 8.05 बजे से 9.28 बजे तक 


शुभ-  12.14 बजे से शाम 1.37 बजे तक  



धन तेरस की पूजा शुभ मुहूर्त में करनी चाहिए। सबसे पहले तेरह दीपक जला कर तिजोरी में कुबेर का पूजन करना चाहिए। देव कुबेर का ध्यान करते हुए उन्हें फूल चढाएं। इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करें। इस दिन स्थिर लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व है।


दिवाली के पांच दिनों में श्रीयंत्र पूजा से मिलती है अचूक धनसंपत्ति।



 इस दिन बर्तन, चांदी खरीदने से इनमें 13 गुणा वृ्द्धि होने की संभावना होती है. और इसके साथ ही इस दिन सूखे धनिया के बीज खरीद कर घर में रखने से भी परिवार की धन संपदा में वृ्द्धि करता है. दीपावली के दिन इन बीजों को खेतों में लागाया जाता है ये बीज व्यक्ति की उन्नति व धन वृ्द्धि के प्रतीक होते है.



धन तेरस की पूजा शुभ मुहुर्त में करनी चाहिए इस दिन 13 दीपक जला कर पुजा करनी चाहिए । देव कुबेर जी को फूल चढ़ाये धूप जलाए । देव कुबेर का ध्यान करते हुए मंत्र का जाप करे ।


यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये

धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा ।’


धनाध्यक्ष श्री कुबेर की पूजा विधि 


दिवाली का त्योहारों दीपों का पर्व माना जाता है। इस दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। लेकिन इनके साथ ही इस दिन भगवान कुबेर की पूजा  का भी विधान हैं। क्योंकि दिवाली की पूजा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक भगवान कुबेर की पूजा न की जाए।


 भगवान कुबेर को धन का देवता माना जाता है और इनकी पूजा माता लक्ष्मी के साथ की जाती है। दिवाली  के दिन भगवान कुबेर की पूजा करने से मां लक्ष्मी अति प्रसन्न होती हैं और कुबेर जी की पूजा करने वालों को अपना आशीर्वाद प्रदान करती हैं तो चलिए जानते हैं दिवाली पर भगवान कुबेर की पूजा विधि।

1. भगवान कुबेर की पूजा धनतेरस और दिवाली के दिन की जाती है। दिवाली के दिन आपको शाम को भगवान गणेश और मां लक्ष्मी के साथ कुबेर जी की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए।

2. इसके लिए आप एक साफ चौकी लें और उस पर गंगाजल छिड़कें। इसके बाद उस पर एक लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर भी गंगाजल छिड़कें।

3. इसके बाद उस चौकी पर अक्षत डालें और भगवान गणेश मां लक्ष्मी और भगवान कुबरे की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

4. प्रतिमा स्थापित करने के बाद अपने आभूषण, पैसे और सभी कीमती चीजें भगवान कुबेर के आगे रखें।

5. इसके बाद अगर आभूषण के डिब्बे पर स्वास्तिक बनाएं या फिर स्वास्तिक बनाकर अपने सभी पैसे और आभूषण उस पर रखें।

6. इसके बाद भगवान कुबेर का तिलक करें और कुबेर जी के साथ- साथ सभी आभूषण और पैसों को अक्षत अर्पित करें।

7. इसके बाद भगवान कुबेर को फल और फूल, माला अर्पित करें और आभूषण और पैसों पर भी फूल अर्पित करें।

8. इसके बाद कुबेर त्वं धनाधीश गृहे ते कमला स्थिता।तां देवीं प्रेषयाशु त्वं मद्गृहे ते नमो नम:।। मंत्र का जाप करें।

9. मंत्र जाप के बाद भगवान कुबेर को मिठाई का भोग लगाएं।

10. इसके बाद भगवान कुबरे की धूप व दीप से आरती उतारें।

11. इसके बाद एक साफ गिलास में जल लेकर भगवान कुबेर को जल अर्पित करें।

12. अंत में भगवान कुबेर को हाथ जोड़कर नमन करें और उनसे जाने अनजाने में हुई भूल के क्षमा प्रार्थना करें और उनसे अपना अर्शीवाद सदा बनाने के लिए भी प्रार्थना करें।


रविशराय गौड़

ज्योतिर्विद

अध्यात्मचिन्तक

9926910965


नारायण श्रीनारायण

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